Monday, 16 December 2019

                                                               बर्फ़ें!
भयानक नाउम्मीदियों के दौर 
अब भी बचे हैं इस धरती पर जीने लायक रंग
कुछ मौके अब भी
हैं सहेजने के प्रकृति को, रिश्तों को
और संवेदनाओं को
जानते हो बर्फ़ का रंग सफ़ेद क्यों है
ताकि दिन ब दिन बहुत
काले हो रहे इस काले से वक्त में बच्चे
देख पाएं ऐसी कोई
झक्क उजली सफेदी जो सिर्फ और सिर्फ
बर्फ़ ने बचा के रखी है
अपने भीतर!

Sunday, 1 December 2019

आकाश की कविता


ये ओस की बूँदें हैं या
आकाश ने धरती पर
एक सुन्दर कविता लिख दी है
रात ही रात में
मगर ये कविता किस लिपि में लिखी है
आने वाले भविष्य की किसी नईं लिपि में
या प्रागइतिहास के अबूझ संकेतों में
इसको पढ़ने की कई कोशिशें की होंगी
भाषाशास्त्री लगे होंगे
पुरातत्व वेत्ता अलग से समझ रहे होंगे
आकाश है कि रोज़ लिख देता है
धरती के बदन पर इसको
सूरज रोज़ उगता है
और इन प्रेम के चिह्नों को
मिटा देता है
लेकिन आकाश मानता नहीं है
अगले दिन फिर रच देता है एक नईं कविता
ये तो हर युग में हुआ है
लिखे हुए को मिटाने की
भरसक नाकाम कोशिश
कोई पढ़े या पढ़े
कोई जलाये चाहे मिटा दे 
लेकिन लिखने वाले मानते कहाँ हैं
लिखते चले जाते हैं
कुछ बूझ कुछ अबूझ
जो पढ़ा जाता है
युगों के बाद
जो आखिर पढ़ा जाता है
प्रेम के भाषाविदों और पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा

Sunday, 24 November 2019

हमारे समय की चिंताएं


यूँ तो हमारे समय की चिंताओं में कई चिंताएं हैं..
लेकिन हमारे समय की चिंताओं में जो एक चिंता हमें लगती है
वो स्कूल की युनिफोर्म पहने गाँव के बच्चों की
जो रोज़ सुबह निकल पड़ते हैं स्कूल के लिए
अक्सर दिख जाते हैं जंगलों से गुज़रती सड़कों पर,पहाड़ी पगडंडियों पर
कंधे पर स्कूल का बस्ता जो फटने के बात ही बदला जाता है.
या पालीथीन में रखी कुछ किताबें.
हाथ पर कुछ सामान लिए हुए.
जिनमें गाँव की छोटी मोटी सस्ती उपजें
सब्ज़ी, दालें और दूध की बाल्टियाँ
जाड़े के दिनों में पतला स्वेटर और जूतों से निकलते अंगूठे
बरसातों में बदन से चिपकती कमीज़ें
अक्सर वे मिल जाते हैं स्कूल के लिए लम्बी दूरियां तय करते
कतिपय हंसी-ठिठोली में उस कठिन सफ़र को काटते
स्कूल में वही रटी रटाई पढाई, मान्यताएं
और नवाचार के नाम पर कुछ पूर्वाग्रह ही नज़र आते हैं..
पहाड़ी पगडंडियों पर सूरज की सुनहरी किरनें पड़ रही है.
वो घरों से निकल चुके हैं.
एक लिस्ट है हाथ में शाम को क्या-क्या सामान लाना है घर का
जो कल रीत चुका है
एक और लिस्ट है उनके बचपन से किशोर हो रहे सपनों की
काश वो भी किसी बाज़ार में पाव भर आध किलो रेट में
खरीदे बेचे जाते होते
या किसी जंगली फल के पेड़ पर लगे होते
और पत्थर मार के तोड़ लेते.
किसी पर्यटक की कार अचानक बरसते जंगल में बंद पड़ जाती है तो
वे धक्का भी लगा देते हैं.
रस्ते में मिलने वाले राहगीरों का बोझ बिन कहे उठा लेते हैं.
ये सब सबक किसी ने सिखाया नहीं है उनको
ये तो बस जिया ही है उन्होंने..
शाम में लौटते हैं घर को
बदन थक कर चूर हो जाता है.
रात के लिए अभी लकड़ियाँ फाडनी हैं.
या पानी भर कर लाना है नौले से,हैण्ड पम्प से
एक-एक लकड़ी के साथ फट पड़ रहा है आक्रोश
कुल्हाड़े की एक-एक चोट के साथ टूट रहे हैं सपने
या एक एक बूँद पानी के साथ पिघल रहे हैं कच्चे ख्वाब
रोटी को सब्ज़ी या नमक के साथ खाकर
 दर्द से टूटते बदन के साथ गिर पड़ते हैं बिस्तर पर
कटे पेड़ की तरह ..
शायद  पगडंडियाँ भी सो रही होंगी उनके इंतज़ार में...