ये ओस की बूँदें
हैं या
एक सुन्दर
कविता लिख दी है
रात ही रात में
मगर ये कविता
किस लिपि में लिखी है
आने वाले भविष्य
की किसी नईं लिपि में
या प्रागइतिहास
के अबूझ संकेतों में
इसको पढ़ने की कई कोशिशें
की होंगी
भाषाशास्त्री
लगे होंगे
पुरातत्व
वेत्ता अलग से समझ रहे होंगे
आकाश है कि रोज़ लिख देता है
धरती के बदन पर इसको
सूरज रोज़ उगता है
और इन प्रेम
के चिह्नों को
मिटा देता है
लेकिन
आकाश मानता नहीं है
अगले दिन फिर रच देता है एक नईं कविता
ये तो हर युग में हुआ है
लिखे हुए को मिटाने
की
भरसक नाकाम
कोशिश
कोई पढ़े या न पढ़े
कोई जलाये
चाहे मिटा दे
लेकिन
लिखने वाले मानते कहाँ हैं
लिखते
चले जाते हैं
कुछ बूझ कुछ अबूझ
जो पढ़ा जाता है
युगों
के बाद
जो आखिर पढ़ा जाता है
प्रेम
के भाषाविदों और पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा
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