Sunday, 1 December 2019

आकाश की कविता


ये ओस की बूँदें हैं या
आकाश ने धरती पर
एक सुन्दर कविता लिख दी है
रात ही रात में
मगर ये कविता किस लिपि में लिखी है
आने वाले भविष्य की किसी नईं लिपि में
या प्रागइतिहास के अबूझ संकेतों में
इसको पढ़ने की कई कोशिशें की होंगी
भाषाशास्त्री लगे होंगे
पुरातत्व वेत्ता अलग से समझ रहे होंगे
आकाश है कि रोज़ लिख देता है
धरती के बदन पर इसको
सूरज रोज़ उगता है
और इन प्रेम के चिह्नों को
मिटा देता है
लेकिन आकाश मानता नहीं है
अगले दिन फिर रच देता है एक नईं कविता
ये तो हर युग में हुआ है
लिखे हुए को मिटाने की
भरसक नाकाम कोशिश
कोई पढ़े या पढ़े
कोई जलाये चाहे मिटा दे 
लेकिन लिखने वाले मानते कहाँ हैं
लिखते चले जाते हैं
कुछ बूझ कुछ अबूझ
जो पढ़ा जाता है
युगों के बाद
जो आखिर पढ़ा जाता है
प्रेम के भाषाविदों और पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा

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